इरोम की १२ साल लंबी भूख हड़ताल में लोकतांत्रिक संघर्षों के प्रति दृढ आस्था, उत्कट आत्मविश्वास, बेमिसाल साहस और एक बेहद मानवीय आत्मा की पीड़ा को देखा-समझा जा सकता है. सच पूछिए तो आज इरोम पूरे देश में लोगों के बुनियादी अधिकारों और हक-हुकूक की लड़ाई के लिए प्रेरणा बन गई हैं.
वे अपनी इस मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं कि जनविरोधी काले कानून- सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून’ १९५८ (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट-अफ्स्पा) को मणिपुर से तुरंत हटाया जाए. वे आज देश में अनथक और समझौता-विहीन संघर्ष, बलिदान और प्रतिबद्धता का दूसरा नाम बन गईं हैं.
लेकिन शर्मनाक अफसोस यह कि दुनिया के ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी है. बारह साल लंबे इस शांतिपूर्ण लेकिन अत्यंत पीडाजनक आंदोलन के बावजूद इस ‘महान लोकतंत्र’ की कुम्भकर्णी निद्रा टूटने का काम नहीं ले रही है. इस मामले में इरोम का संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के लिए परीक्षा बन गया है और यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि वह मणिपुर से लेकर कश्मीर तक इस परीक्षा में पिछले कई सालों से लगातार फेल हो रहा है. इस तथ्य के बावजूद कि मणिपुर में यह केवल इरोम का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है बल्कि उनके संघर्ष में मणिपुर की अधिकांश महिलाओं और पुरुषों की आवाज़ शामिल हैं. इरोम इस अनूठे संघर्ष की प्रतीक भर हैं.
आखिर हम कैसे भूल सकते हैं कि वर्ष २००४ में जब असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर युवा थांगजाम मनोरमा की बलात्कार के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी. उस शर्मनाक घटना ने पूरे मणिपुर की आत्मा को झकझोर दिया था. लोगों खासकर महिलाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था.
इरोम भी ऐसे ही हालत में वर्ष २००० में आमरण अनशन पर बैठीं. उस साल असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर घाटी के मलोम कसबे में बस स्टैंड पर इंतज़ार कर रहे दस निर्दोष लोगों को भून डाला था जिसमें एक ६२ साल की महिला के अलावा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार जीतनेवाला १८ वर्षीय युवा सिनम चंद्रमणि भी शामिल था.
मलोम नरसंहार जैसे मणिपुर की घायल आत्मा पर मरणान्तक प्रहार था जिसने पूरे मणिपुर के साथ-साथ २८ वर्षीया इरोम शर्मिला चानू को भी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया. उसके बाद की कहानी एक इरोम के जीवट भरे, अडिग और धैर्यपूर्ण संघर्ष का ऐसा जीवित इतिहास है जो हम अपनी आँखों के सामने बनता हुआ देख रहे हैं.
इरोम की लड़ाई मणिपुर में शांति बहाली की लड़ाई है. यह शांति बिना अफ्स्पा को हटाए, मानवाधिकारों का हनन रोके, लोगों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों को बहाल किये और राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू किये संभव नहीं है. मणिपुर में निर्दोषों का बहुत खून बह चुका है. इन खून के दागों से रंगा भारतीय लोकतंत्र का चेहरा बहुत बदसूरत और भयावह दिखता है. इसके बावजूद भारतीय राज्य अपनी भूलों को सुधारने और मणिपुर में शांति बहाली को एक मौका देने को तैयार नहीं है तो मानना पड़ेगा कि इस लोकतंत्र में न मानवीय आत्मा है, न आत्मविश्वास और न ही साहस.

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