अमेरिका में बढ़ती गैर बराबरी, बेरोजगारी, आम लोगों के लगातार गिरते जीवन स्तर और इस सबके लिए कारपोरेट लालच और लूट को जिम्मेदार मानते हुए राजनीतिक सत्ता पर बड़ी कारपोरेट पूंजी के आक्टोपसी कब्जे के खिलाफ ‘वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा’ (आकुपाई वाल स्ट्रीट) आंदोलन काफी चर्चित रहा !इस बीच, यह आंदोलन न्यूयार्क में आवारा पूंजी के गढ़ वाल स्ट्रीट से निकलकर न सिर्फ पूरे अमेरिका में फ़ैल गया है बल्कि अक्टूबर के मध्य में दुनिया भर के ९०० से ज्यादा शहरों खासकर यूरोप में जबरदस्त प्रदर्शन हुए हैं.
यही नहीं, कई शहरों में ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की तर्ज पर आवारा वित्तीय पूंजी के स्थानीय केन्द्रों पर कब्जे के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लोगों में कितना गुस्सा भरा हुआ है.
आश्चर्य नहीं कि शुरू में जिस आंदोलन को यह कहकर अनदेखा करने की कोशिश की गई कि यह आर्थिक मंदी और उससे निपटने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती के खिलाफ तात्कालिक गुस्से-भड़ास का प्रदर्शन है और इस अराजक-दिशाहीन भीड़ के गुबार को बैठने में देर नहीं लगेगी, उसने कई कमजोरियों के बावजूद देखते-देखते आम जनमानस को इस तरह छू लिया है कि उसे अब और फैलने से रोकने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं.
यही कारण है कि न्यूयार्क में वाल स्ट्रीट के पास लिबर्टी पार्क में जो लोग डेरा-डंडा डाले बैठे हैं, उनकी संख्या भले कम हो लेकिन उनके उठाए सवालों और मुद्दों का अमेरिका में ही नहीं, पूरी दुनिया में असर साफ दिखाई पड़ने लगा है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका में पिछले कुछ दिनों में मीडिया समूहों द्वारा कराये गए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में कोई ४३ फीसदी से ५५ फीसदी नागरिकों ने ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की ओर से उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया है. यही नहीं, सी.बी.एस न्यूज-न्यूयार्क टाइम्स सर्वेक्षण के मुताबिक, कोई ६६ फीसदी अमरीकी नागरिकों को लगता है कि देश में सम्पदा का बंटवारा असमान है.
साफ़ है कि इस आंदोलन ने जो सवाल और मुद्दे उठाए हैं, उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है. इसके कारण राजनीतिक नेतृत्व से लेकर कारपोरेट मीडिया तक को इसका नोटिस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
यही नहीं, कई शहरों में ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की तर्ज पर आवारा वित्तीय पूंजी के स्थानीय केन्द्रों पर कब्जे के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लोगों में कितना गुस्सा भरा हुआ है.
आश्चर्य नहीं कि शुरू में जिस आंदोलन को यह कहकर अनदेखा करने की कोशिश की गई कि यह आर्थिक मंदी और उससे निपटने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती के खिलाफ तात्कालिक गुस्से-भड़ास का प्रदर्शन है और इस अराजक-दिशाहीन भीड़ के गुबार को बैठने में देर नहीं लगेगी, उसने कई कमजोरियों के बावजूद देखते-देखते आम जनमानस को इस तरह छू लिया है कि उसे अब और फैलने से रोकने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं.
यही कारण है कि न्यूयार्क में वाल स्ट्रीट के पास लिबर्टी पार्क में जो लोग डेरा-डंडा डाले बैठे हैं, उनकी संख्या भले कम हो लेकिन उनके उठाए सवालों और मुद्दों का अमेरिका में ही नहीं, पूरी दुनिया में असर साफ दिखाई पड़ने लगा है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका में पिछले कुछ दिनों में मीडिया समूहों द्वारा कराये गए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में कोई ४३ फीसदी से ५५ फीसदी नागरिकों ने ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की ओर से उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया है. यही नहीं, सी.बी.एस न्यूज-न्यूयार्क टाइम्स सर्वेक्षण के मुताबिक, कोई ६६ फीसदी अमरीकी नागरिकों को लगता है कि देश में सम्पदा का बंटवारा असमान है.
साफ़ है कि इस आंदोलन ने जो सवाल और मुद्दे उठाए हैं, उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है. इसके कारण राजनीतिक नेतृत्व से लेकर कारपोरेट मीडिया तक को इसका नोटिस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

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