
भ्रष्टाचार का सवाल सार्वजनिक संसाधनों और गरीबों की जल-जंगल-जमीन की कारपोरेट लूट से लेकर राजनीतिक भ्रष्टाचार, अपराधीकरण और धनबल के खिलाफ मुकम्मल लड़ाई तक जाता है.
कुछ मित्रों की राय में, अन्ना हजारे का आंदोलन “खाए-पिए-अघाये, अंग्रेजीदां नौकरीपेशा-कारोबारी मध्यवर्ग” का आंदोलन है. वे कुछ हद तक सही हैं. लेकिन क्या इस आधार पर इसे प्रतिक्रांति घोषित कर दिया जाए? हर बात पर “क्या फर्क पड़ता है” कहनेवाला मध्यवर्ग अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल के सीमित मुद्दे को लेकर सड़कों पर है तो इसका स्वागत करना चाहिए या विरोध?
भूलिए मत, धीरे-धीरे इस आंदोलन का दायरा फ़ैल रहा है. इसमें छात्र-नौजवानों के साथ निम्न मध्यमवर्गीय तबके भी शामिल हो रहे हैं. कल को यह और व्यापक हो सकता है. इसका दायरा भी और मुद्दे भी..हमें इस सम्भावना को हकीकत बनाने की तैयारी करनी चाहिए.
जागते रहो सोनेवालों....हो सकता है कि यह भी ‘खिचड़ी विप्लव’ साबित हो..हो सकता है कि लोगों के साथ फिर धोखा हो..लेकिन लोगों का जागना और सड़कों पर उतरना सच्चे जनतंत्र को हासिल करने की लड़ाई के लिए शुभ संकेत है..
यह भी कि असफल क्रांतियां ही असली क्रांतियों की जमीन तैयार करती हैं..मुकम्मल और रेडिकल बदलाव की लड़ाई में लगे वाम-जनवादी और क्रांतिकारी संगठनों के लिए यह एक बड़ा मौका है.
कुछ राजनीतिक पूर्वानुमान: अगर यह आंदोलन और तीन-चार दिन चल गया तो यू.पी.ए सरकार को लगभग सभी मांगों को मानना पड़ेगा..अगर सात दिन चला तो कांग्रेस और सरकार को कपिल सिब्बल जैसों की राजनीतिक बलि देनी पड़ सकती है..और अगर १०-१२ दिन खिंचा तो खुद प्रधानमंत्री के लिए टिके रह पाना मुश्किल हो जाएगा..
इरोम की १२ साल लंबी भूख हड़ताल में लोकतांत्रिक संघर्षों के प्रति दृढ आस्था, उत्कट आत्मविश्वास, बेमिसाल साहस और एक बेहद मानवीय आत्मा की पीड़ा को देखा-समझा जा सकता है. सच पूछिए तो आज इरोम पूरे देश में लोगों के बुनियादी अधिकारों और हक-हुकूक की लड़ाई के लिए प्रेरणा बन गई हैं.
वे अपनी इस मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं कि जनविरोधी काले कानून- सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून’ १९५८ (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट-अफ्स्पा) को मणिपुर से तुरंत हटाया जाए. वे आज देश में अनथक और समझौता-विहीन संघर्ष, बलिदान और प्रतिबद्धता का दूसरा नाम बन गईं हैं.
लेकिन शर्मनाक अफसोस यह कि दुनिया के ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी है. बारह साल लंबे इस शांतिपूर्ण लेकिन अत्यंत पीडाजनक आंदोलन के बावजूद इस ‘महान लोकतंत्र’ की कुम्भकर्णी निद्रा टूटने का काम नहीं ले रही है. इस मामले में इरोम का संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के लिए परीक्षा बन गया है और यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि वह मणिपुर से लेकर कश्मीर तक इस परीक्षा में पिछले कई सालों से लगातार फेल हो रहा है. इस तथ्य के बावजूद कि मणिपुर में यह केवल इरोम का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है बल्कि उनके संघर्ष में मणिपुर की अधिकांश महिलाओं और पुरुषों की आवाज़ शामिल हैं. इरोम इस अनूठे संघर्ष की प्रतीक भर हैं.
आखिर हम कैसे भूल सकते हैं कि वर्ष २००४ में जब असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर युवा थांगजाम मनोरमा की बलात्कार के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी. उस शर्मनाक घटना ने पूरे मणिपुर की आत्मा को झकझोर दिया था. लोगों खासकर महिलाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था.
इरोम भी ऐसे ही हालत में वर्ष २००० में आमरण अनशन पर बैठीं. उस साल असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर घाटी के मलोम कसबे में बस स्टैंड पर इंतज़ार कर रहे दस निर्दोष लोगों को भून डाला था जिसमें एक ६२ साल की महिला के अलावा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार जीतनेवाला १८ वर्षीय युवा सिनम चंद्रमणि भी शामिल था.
मलोम नरसंहार जैसे मणिपुर की घायल आत्मा पर मरणान्तक प्रहार था जिसने पूरे मणिपुर के साथ-साथ २८ वर्षीया इरोम शर्मिला चानू को भी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया. उसके बाद की कहानी एक इरोम के जीवट भरे, अडिग और धैर्यपूर्ण संघर्ष का ऐसा जीवित इतिहास है जो हम अपनी आँखों के सामने बनता हुआ देख रहे हैं.
इरोम की लड़ाई मणिपुर में शांति बहाली की लड़ाई है. यह शांति बिना अफ्स्पा को हटाए, मानवाधिकारों का हनन रोके, लोगों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों को बहाल किये और राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू किये संभव नहीं है. मणिपुर में निर्दोषों का बहुत खून बह चुका है. इन खून के दागों से रंगा भारतीय लोकतंत्र का चेहरा बहुत बदसूरत और भयावह दिखता है. इसके बावजूद भारतीय राज्य अपनी भूलों को सुधारने और मणिपुर में शांति बहाली को एक मौका देने को तैयार नहीं है तो मानना पड़ेगा कि इस लोकतंत्र में न मानवीय आत्मा है, न आत्मविश्वास और न ही साहस.
अमेरिका में बढ़ती गैर बराबरी, बेरोजगारी, आम लोगों के लगातार गिरते जीवन स्तर और इस सबके लिए कारपोरेट लालच और लूट को जिम्मेदार मानते हुए राजनीतिक सत्ता पर बड़ी कारपोरेट पूंजी के आक्टोपसी कब्जे के खिलाफ ‘वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा’ (आकुपाई वाल स्ट्रीट) आंदोलन काफी चर्चित रहा !इस बीच, यह आंदोलन न्यूयार्क में आवारा पूंजी के गढ़ वाल स्ट्रीट से निकलकर न सिर्फ पूरे अमेरिका में फ़ैल गया है बल्कि अक्टूबर के मध्य में दुनिया भर के ९०० से ज्यादा शहरों खासकर यूरोप में जबरदस्त प्रदर्शन हुए हैं.
यही नहीं, कई शहरों में ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की तर्ज पर आवारा वित्तीय पूंजी के स्थानीय केन्द्रों पर कब्जे के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लोगों में कितना गुस्सा भरा हुआ है.
आश्चर्य नहीं कि शुरू में जिस आंदोलन को यह कहकर अनदेखा करने की कोशिश की गई कि यह आर्थिक मंदी और उससे निपटने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती के खिलाफ तात्कालिक गुस्से-भड़ास का प्रदर्शन है और इस अराजक-दिशाहीन भीड़ के गुबार को बैठने में देर नहीं लगेगी, उसने कई कमजोरियों के बावजूद देखते-देखते आम जनमानस को इस तरह छू लिया है कि उसे अब और फैलने से रोकने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं.
यही कारण है कि न्यूयार्क में वाल स्ट्रीट के पास लिबर्टी पार्क में जो लोग डेरा-डंडा डाले बैठे हैं, उनकी संख्या भले कम हो लेकिन उनके उठाए सवालों और मुद्दों का अमेरिका में ही नहीं, पूरी दुनिया में असर साफ दिखाई पड़ने लगा है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका में पिछले कुछ दिनों में मीडिया समूहों द्वारा कराये गए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में कोई ४३ फीसदी से ५५ फीसदी नागरिकों ने ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की ओर से उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया है. यही नहीं, सी.बी.एस न्यूज-न्यूयार्क टाइम्स सर्वेक्षण के मुताबिक, कोई ६६ फीसदी अमरीकी नागरिकों को लगता है कि देश में सम्पदा का बंटवारा असमान है.
साफ़ है कि इस आंदोलन ने जो सवाल और मुद्दे उठाए हैं, उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है. इसके कारण राजनीतिक नेतृत्व से लेकर कारपोरेट मीडिया तक को इसका नोटिस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
यही नहीं, कई शहरों में ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की तर्ज पर आवारा वित्तीय पूंजी के स्थानीय केन्द्रों पर कब्जे के लिए धरना-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ लोगों में कितना गुस्सा भरा हुआ है.
आश्चर्य नहीं कि शुरू में जिस आंदोलन को यह कहकर अनदेखा करने की कोशिश की गई कि यह आर्थिक मंदी और उससे निपटने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती के खिलाफ तात्कालिक गुस्से-भड़ास का प्रदर्शन है और इस अराजक-दिशाहीन भीड़ के गुबार को बैठने में देर नहीं लगेगी, उसने कई कमजोरियों के बावजूद देखते-देखते आम जनमानस को इस तरह छू लिया है कि उसे अब और फैलने से रोकने में सरकारों के पसीने छूट रहे हैं.
यही कारण है कि न्यूयार्क में वाल स्ट्रीट के पास लिबर्टी पार्क में जो लोग डेरा-डंडा डाले बैठे हैं, उनकी संख्या भले कम हो लेकिन उनके उठाए सवालों और मुद्दों का अमेरिका में ही नहीं, पूरी दुनिया में असर साफ दिखाई पड़ने लगा है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका में पिछले कुछ दिनों में मीडिया समूहों द्वारा कराये गए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में कोई ४३ फीसदी से ५५ फीसदी नागरिकों ने ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा’ आंदोलन की ओर से उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया है. यही नहीं, सी.बी.एस न्यूज-न्यूयार्क टाइम्स सर्वेक्षण के मुताबिक, कोई ६६ फीसदी अमरीकी नागरिकों को लगता है कि देश में सम्पदा का बंटवारा असमान है.
साफ़ है कि इस आंदोलन ने जो सवाल और मुद्दे उठाए हैं, उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है. इसके कारण राजनीतिक नेतृत्व से लेकर कारपोरेट मीडिया तक को इसका नोटिस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

दिल्ली की वह बहादुर लड़की शरीर और मन पर हुए प्राणान्तक घावों के बावजूद जीना चाहती थी. देश के करोड़ों लोग भी यही चाहते थे. लेकिन वह लड़ते हुए एक शहीद की तरह चली गई. यह सही है कि वह भारतीय समाज में स्त्रियों के खिलाफ होनेवाली बर्बर यौन हिंसा और भेदभाव की पहली शहीद नहीं है और न आखिरी.
उसके जाने के बाद भी दिल्ली, पंजाब, बिहार, गुजरात से लेकर बंगाल तक से स्त्रियों पर यौन हिंसा, बलात्कार और हत्या की खबरें आ रही हैं. अखबारों और चैनलों में अब भी ऐसी ख़बरों की भरमार है. लेकिन इस बार एक बड़ा फर्क है. इस बार अखबारों और न्यूज चैनलों में स्त्रियों पर होनेवाली बर्बर हिंसा की खबरों से ज्यादा जगह और सुर्ख़ियों में उसके विरोध की खबरें हैं.
उस बहादुर लड़की के संघर्ष और शहादत ने देश के लाखों नौजवानों खासकर लड़कियों और आम लोगों में स्त्रियों के खिलाफ होनेवाली बर्बर हिंसा और आपराधिक भेदभाव के खिलाफ लड़ने का जज्बा भर दिया है. दिल्ली से लेकर देश भर के छोटे-बड़े शहरों-कस्बों में हजारों-लाखों युवा और आम नागरिक ‘हमें न्याय चाहिए’ और ‘हमें चाहिए- आज़ादी’ के नारों के साथ सड़कों पर उतर आए हैं.
खासकर दिल्ली में जिस बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर और उसमें भी खासकर सत्ता के केन्द्र रायसीना पहाड़ी, विजय चौक और इंडिया गेट से लेकर जंतर-मंतर पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं और पुलिसिया दमन के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, उसने सत्ता प्रतिष्ठान के साथ-साथ समूचे राजनीतिक वर्ग को एक साथ चौंका और डरा दिया है. हड़बड़ी और घबड़ाहट में केंद्र और दिल्ली सरकार ने कानून में बदलाव और दिल्ली गैंग रेप की जांच के लिए दो न्यायिक आयोग बनाने से लेकर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने, दिल्ली में सार्वजनिक बसों की संख्या बढ़ाने जैसे कई फैसले किये हैं.
यही नहीं, प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष तक रोज बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बनाने से लेकर दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के वायदे कर रहे हैं. लेकिन लोगों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है.
इंडिया गेट से लेकर विजय चौक तक हजारों की संख्या में पुलिस और अर्द्ध सैनिक बल तैनात कर सैन्य छावनी बना देने और मेट्रो स्टेशन बंद करने के बावजूद हजारों की संख्या में नौजवान जंतर-मंतर पहुंचकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं. अपना गुस्सा जाहिर करने पहुँच रहे लोगों में छात्र-युवा लड़के और लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा है लेकिन उसमें ४० से ज्यादा उम्र के पुरुषों और महिलाओं की संख्या भी अच्छी-खासी है.
जनआन्दोलन से ही व्यवस्था परिवर्तन एवं प्रतिरोध की क्षमता उत्पन्न होगी-! आज देश में गरीबी, भुखमरी, अनियंत्रित व्यवस्था आम हो गयी है | एक तरफ लोग दिन प्रतिदिन आमिर होते जा रहे हैं तो दूसरी और गरीबी भी सुरषा के मुंह की तरह फैलती जा रही है, और पता नहीं कितना फैलेगी | एक तरफ अनाज बर्बाद हो रहा है, दूसरी तरफ लोग दाने-दाने को मोहताज़ हैं| एक तरफ हम विश्व मंच से अपने विकसित होने की बात करते फिर रहे हैं तो दूसरी और लोग एक दूसरे को देख कर आंहे भरते नजर आ रहे हैं | इस देश का ही एक भाग लगातार बेवजह सुलग रहा है और सरकार सिर्फ दिलासा देती फिर रही है | सरकार को लगातार आंतरिक ताकतों द्वारा चुनौती मिल रही है और सरकार सिर्फ घोषणा और बयान देकर अपना काम पूरा कर रही है | आज बेरोजगारी की स्थिति और भी भयावह होती जा रही है ,लेकिन यहाँ भी सिर्फ आश्वाशन ही मिलता दिख रहा है | अब जो सबसे बड़ी बात है वो यह क्या की इतना कुछ होने के बाद भी हम चुप क्यूँ हैं | तो इसका सीधा सा एक ही जवाब है की कोई आगे आने की हिम्मत नहीं कर रहा है | एक बात तो तय है की कोईइतना तो तय है की कोई न कोई तो आगे आएगा ही | लेकिन सबसे बड़ी बात जो है वो ये क्या की आज का युवा वर्ग सिर्फ अपने तक ही सीमित होकर रह गया है | उसे देश दुनिया से ज्यादा कुछ लेना देना नहीं रह गया है| यह स्थिति देश के लिए खतरनाक है | हाल में मैंने अपने तीन चार मित्रों से कहा की हमलोगों को देश के लिए कुछ करना चाहिए तो वो सोचने वाली स्थिति में आ गए | और सबसे जो सबसे बड़ी बात है वो ये क्या की उनमे से ज्यादातर ने कहा क इतुम तो राजनीती के कीड़े हो तो बनो , हमलोगों के भी कुछ कल्याण कर देना| मुझे बड़ा ही ताज्जुब हुआ , और खुद पर शर्म भी आयी की पढ़े लिखे लोग ऐसा सोच सकते हैं तो औरों की तो बात ही कुछ और है | लेकिन मेरा भरोसा है की एक दिन वही लोग आयेंगे और कहेंगे की हम भी कुछ करना चाहते हैं | मेरी शिकायत है की आखिर क्या हम इतने बेफिक्र हो गए हैं की अपने में ही चूर रहते हैं | दुःख तो होता ही है लेकिन एक पल यह भी सोचता हूँ की सही ही तो कर रहे हैं | लेकिन दूसरे पल गुस्सा भी आता है जब वो कहते हैं की राजनीत देश को बर्बाद करके ही दम लेगी | अरे भाई जब आप गली देते हो तो उसे सुधारने की कोशिश तो करो , वो आपसे होगा नहीं तो आप लाया खी नहीं हो उस विषय में कुछ कहने को | मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ की आज जो स्थिति बन रही है वो आज न कल एक आन्दोलन का रूप लेने वाली है | जनता का खून कभी तो गरम होगा , लोग कभी तो कुछ देश के बारे में सोचेंगे | और युवा वर्ग कभी तो अपने अधिकार के लिए आगे आएगा | सब परिस्थिति पनप रही है बस अब चिंगारी फूटनी बांकी है | आग तो अक्ब की लग चूकी है और बहुत से लोग ऐसा हैं जो झुलसने वाले हैं | अब फिर से एक आपातकाल की जरूरत भी आ सकती है जब देश के लोग एकजुट हों और एक करार जवाब दें |




